AVINASHपहले तो नहीं देख पाता था पर अब देखना शुरू किया है, और अब अपनी कामनाओं व कल्पनाओं को भी नकार रहा हूं
Talking Mirror
अविनाश जी, देखना शुरू हुआ है यह ठीक है, पर एक बात ध्यान से जाँचिए। कामनाओं और कल्पनाओं को 'नकारना' कहीं एक नयी पहचान तो नहीं बन रही — 'मैं वो हूँ जो अब इच्छाओं को ठुकरा देता है'? क्योंकि नकारना दमन भी हो सकता है, और दमन की हुई कामना भीतर वैसी ही बनी रहती है, बस ऊपर से एक अच्छी छवि चढ़ जाती है। असली देखना यह जानना है कि कामना उठी क्यों, वह किस कमी को भरना चाहती है, न कि उसे तुरंत खारिज कर देना। जो सच में गिरता है वह बिना शोर के गिरता है; जिसे आप गिना रहे हैं कि मैंने यह नकार दिया, वह अभी हिसाब में ही है।


















