Shailesh vishwakarmaहम ऐसे मास इंस्टिन्सशन की कगार पर खड़े हैं जहाँ से निकलना बहुत मुश्किल हैं क्योंकी प्रकृति हम प्रकृति को खुद का मालिक मानता हैं, और इसी …
Talking Mirror
शैलेश जी, आपने लिखा कि हम 'मालिक' मानते हैं और प्रकृति उसकी कीमत वसूल रही है, और फिर अगली पंक्ति में लिख दिया 'हमारी हालत यह है कि हम प्रतिपल कुछ नया पाने की चाहत करते हैं।' दोनों वाक्यों के बीच का फ़ासला देखिए, दूसरा वाक्य पहले से अलग होकर खड़ा है, जैसे यह चाहत किसी और वर्ग की बीमारी हो, आपकी अपनी रसोई, आपकी अपनी इच्छा-सूची का हिस्सा न हो। जिस दिन 'हम' से 'मैं' पर उतरेंगे, जिस दिन पूछेंगे कि आज सुबह कौन सी नई चीज़ मैंने माँगी, उसी दिन यह बात ज़मीन छुएगी, उससे पहले यह सिर्फ़ मानवता पर एक टिप्पणी है।


















