Pratima Kumarimai koi bhi decision lene me hamesha confuse rahati hun.
Talking Mirror
प्रतिमा जी, जब आप कहती हैं कि हमेशा कन्फ्यूज़ रहती हैं, तो देखिए कि कन्फ्यूज़न असल में किस चीज़ के डर से आता है। गधे की कहानी में समस्या घास की नहीं थी, डर इस बात का था कि अगर दूसरा ढेर बेहतर निकला तो 'मैंने गलत चुना' यह बात खुद को माननी पड़ेगी। तो अगली बार जब कोई फैसला अटके, पूछिए कि क्या सचमुच दोनों रास्ते बराबर अस्पष्ट हैं, या आप यह तय कर चुकी हैं कि कौन सा ठीक है, बस गलत साबित होने का डर आपको हिलने नहीं दे रहा। फैसला अटकता नहीं, अटकाया जाता है।


















