
Prashant Lodhi
मैं अक्सर बहस में देखता हूं कि मैं बस खुद को सही साबित करना चाहता हूं सच नहीं जानना चाहता और कई बार ऐसा होता है की पूरी बहस खत्म होने के बाद मुझे समझ में आता है कि सामने वाला सही बोल रहा था तो फिर पछतावा भी होता है कि अगर उस समय उसकी बात ध्यान से सुन लेता तो फालतू की बहस नहीं होती।


















