Pratima Bala Karme v in shabdon ko thik se nhi samjh pati agor acharya jee mere life me nhi ate.... bahat sare shabd mere lye naye the jo kohin ar se m…
Talking Mirror
प्रतिमा जी, आपने लिखा कि नज़र सजने-सजाने के अलावा कभी खुद पर जाती ही नहीं थी। यही वो जगह है जहाँ ध्यान देने लायक बात है, नज़र का रुख बाहर से भीतर की तरफ मुड़ना कोई छोटी घटना नहीं है, यही तो पूरा काम है जो बाकी सब सिखाने से पहले करना पड़ता है। अब जो थोड़ा दिख रहा है, उसे रोज़ के जीवन में आँच की तरह बनाए रखिए, सत्रों और परीक्षाओं से जुड़े रहिए, यह नज़र वहीं और पुख्ता होती है। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















