
इस लेख का मतलब है कि यदि हम इस योग्य है कि घर की बात हो या फिर बाहर की जहां सामुहिक कार्य हो रहे हैं , जहां सभी के हित की बात हो रही है । वहां जो भी योगदान लग रहें हैं मिल जुलकर करना चाहिए मुफ्त की सेवा, मुफ्त की रोटी नहीं खानी चाहिए। क्योंकि हमें लगता है कि हम चालाकी कर रहे हैं बिना योगदान के भी लाभ उठा रहे हैं। किंतु ऐसा नहीं है कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में कभी शरीर को लेकर, कभी मानसिक विमारी को लेकर या कभी किसी अन्य कारणों से भरपाई करनी ही पड़ती है। जैसे उदाहरण के तौर पर आचार्य जी अपनी शिक्षा दुनिया भर में सभी तक पहुंचाना चाह रहे हैं और सभी लोग उनकी शिक्षाओं का फायदा भी उठा रहे हैं पर योगदान के रूप में कुछ भी नहीं दे रहे हैं जिनके पास नहीं है बात समझ आती है पर जो जितनी क्षमता रखता ईमानदारी से दे सकता है ना । अब जो सक्षम रहते हुए भी चोरी करेगा उनके परिश्रम, प्रेम, ज्ञान का कर्जदार होगा और बहुत बुरी तरह फंसेगा, जिसकी वह कल्पना भी नहीं कर सकता है।


















