
आज से 35-40 साल पहले तो हमारे समाज में भी नाक - कान छिदवाने की परम्परा बहुत प्रचलित थी। हमने भी वो सब खुशी खुशी किया। आज से 13 साल पहले मैंने अपनी बेटी की कान भी छिदवाए, वो सुंदर लग रही थी, मैं काफी खुश थी । 2019 से आचार्य जी को सुनने का मेरे विचारों पर भी प्रभाव पड़ने लगा और समझ में आने लगा कि ये सब धर्म का हिस्सा नहीं है , जरूरी नहीं कि स्त्री को हमेशा साज - श्रृंगार करके ही रहना चाहिए। बाद में मैंने अपनी बेटी का नाक नहीं छिदवाए, कई बार मुझे सुनना भी पड़ा कि शादी के बाद बाली कैसे पहनेगी, मेरा जवाब था कि यदि उसे ये सब जरूरी लगेगा तो वो अपना देख लेगी शादी के बाद। बिना नाक में बाली पहने क्या शादी नहीं होगी। बचपन में मैंने नारी - धर्म की किताब पढ़ी थी उसने मेरी सोच को भी बहुत बुरे तरीके से खराब कर दिया था, मैंने वो सब किया था जैसा कि उसमें लिखा था, लेकिन सब करने के बाद भी कोई खुश नहीं रहता था, तो मैं भी अगले जन्म की व्यर्थ की चिंता छोड़ दी, अगले जन्म में भगवान क्या करेंगे वो तो तब देखो जाएगा, इस जन्म में तो शांति मिले। मैंने पति को भगवान की छवि से नीचे उतारकर life - partner की जगह दे दी। बाकी members को भी सही जगह दी और आज सब काफी खुश भी हैं मुझसे। आचार्य जी ठीक ही कहते हैं कि प्रथम को प्रथम की जगह दो, सबकी अपनी जगह होती है


















