Sandeep Kumarए- जहां अपना फायदा दिखता है, वहां दूसरों के फायदे को इग्नोर करता हूं।
Talking Mirror
संदीप जी, यहाँ एक बात और गौर करने की है - आपने जो विकल्प चुना है वह बाहर कहीं घटित होने वाली बात जैसा लग रहा है, मानो यह कोई सामान्य नियम हो। असली सवाल यह है कि आपके अपने जीवन में, अभी, कहाँ ऐसा हुआ है कि किसी का फायदा दिख गया और दूसरे के नुकसान को जानबूझकर नज़रअंदाज़ किया गया हो। कोई ठोस उदाहरण याद कीजिए - किसी रिश्ते में, किसी सौदे में, किसी छोटी सी बात में - जहाँ आपने देखा और फिर भी देखना बंद कर दिया। सामान्यीकरण आसान है, अपने ही एक वाकये को पूरी ईमानदारी से देखना कठिन।


















