
क्रम वेदांत का शब्द सरल अर्थ 1 ब्रह्म परम सत्य, जो समस्त अस्तित्व का आधार है 2 आत्मा वास्तविक ‘मैं’, देह-मन से परे चेतना 3 आत्मन् स्वयं का वास्तविक स्वरूप 4 सत्य जो वास्तव में है, जिसका अस्तित्व अपरिवर्तित है 5 चैतन्य चेतना, जानने-देखने की सत्ता 6 सत् शुद्ध अस्तित्व, जो है 7 आनंद पूर्ण तृप्ति, जिसमें कोई अभाव नहीं 8 पूर्ण जिसमें कुछ भी जोड़ने या घटाने की आवश्यकता नहीं 9 अनंत जिसकी कोई सीमा नहीं 10 अद्वैत जहाँ दूसरा या द्वैत नहीं है 11 निर्गुण गुणों और विशेषताओं से रहित 12 निराकार जिसका कोई निश्चित आकार या रूप नहीं 13 निरंजन जो किसी मलिनता या दोष से अछूता है 14 निर्विकार जिसमें कोई विकार या परिवर्तन नहीं 15 निष्कल जो किसी भाग में विभाजित नहीं है 16 निष्क्रिय जो कर्म करने वाला नहीं है 17 निरपेक्ष जो किसी पर निर्भर नहीं है 18 अकर्ता जो स्वयं को कर्मों का कर्ता नहीं मानता 19 अभोक्ता जो स्वयं को कर्मों के फल का भोक्ता नहीं मानता 20 असंग जो किसी वस्तु या संबंध से बंधा नहीं है 21 अव्यय जिसका क्षय या नाश नहीं होता 22 अजन्मा जिसका जन्म नहीं हुआ 23 अमृत जो मृत्यु और नाश से परे है 24 शाश्वत जो सदा बना रहता है 25 नित्य जो हमेशा है, जिसका आरंभ या अंत नहीं 26 कूटस्थ जो परिवर्तन के बीच भी अपरिवर्तित रहता है 27 साक्षी जो घटनाओं और विचारों को देखता है, उनसे तादात्म्य नहीं करता 28 द्रष्टा देखने वाला, साक्षी चेतना 29 परम सर्वोच्च, जिसके आगे कुछ नहीं 30 परमात्मा सर्वोच्च आत्मा; परम सत्य 31 पुरुष चेतन सत्ता; जो प्रकृति से भिन्न है 32 स्वप्रकाश जिसे प्रकाशित करने के लिए किसी दूसरे प्रकाश की आवश्यकता नहीं 33 ज्योति प्रकाश; अज्ञान को प्रकाशित करने वाली चेतना का संकेत 34 प्रकाश वह जिसके कारण सब कुछ जाना या दिखाई देता है 35 कैवल्य पूर्ण एकत्व/अकेलापन; प्रकृति के बंधन से पूर्ण स्वतंत्रता 36 मोक्ष बंधन और अज्ञान से मुक्ति 37 मुक्ति बंधन से स्वतंत्रता 38 शांति द्वंद्व और अशांति से मुक्त अवस्था 39 अभय भय से पूर्ण स्वतंत्रता 40 निर्वाण अहंकार और तृष्णा के शांत हो जाने का संकेत 41 तुरीय जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से परे चौथी अवस्था का संकेत 42 एकमेव केवल एक ही; दूसरा नहीं 43 अखंड जो टुकड़ों या भागों में विभाजित नहीं है 44 अविभक्त जो विभाजित नहीं किया जा सकता 45 अचिंत्य जिसे सामान्य विचारों से पूरी तरह नहीं जाना जा सकता 46 अव्यक्त जो इंद्रियों के सामने व्यक्त रूप में नहीं है 47 अगोचर जो इंद्रियों की पकड़ में नहीं आता 48 अतीन्द्रिय जो इंद्रियों से परे है 49 नेति-नेति यह नहीं, यह भी नहीं; सभी सीमित धारणाओं का निषेध 50 न इति यह नहीं है; किसी सीमित वस्तु को सत्य मानने से इनकार एक महत्वपूर्ण बात: इन शब्दों को सत्य की परिभाषा समझना ठीक नहीं होगा। वेदांत में ये अधिकतर संकेत (pointer) हैं। विशेषकर नेति-नेति, निर्गुण, निराकार, अकर्ता, असंग जैसे शब्द हमें यह दिखाते हैं कि सत्य को किसी सीमित वस्तु या मानसिक कल्पना में कैद नहीं किया जा सकता। .2. मेरी भाषा कैसी होती है? मेरी भाषा अक्सर सकारात्मकता वाली होती है। जब मैं सत्य या उच्चतम की बात करता हूँ, तो मैं उसे “शांति”, “आनंद”, “मुक्ति”, “प्रकाश”, “पूर्णता” जैसी चीज़ों के रूप में व्यक्त करने लगता हूँ। शायद इसका कारण यह है कि अहंकार को कुछ पाना और कुछ बनना समझ में आता है, लेकिन “कुछ छोड़ना” बहुत कठिन लगता है। अगर मैं कहता हूँ कि सत्य = आनंद, तो मन तुरंत पूछता है—“वह आनंद मुझे कैसे मिलेगा?” फिर सत्य भी मेरे लिए एक उपलब्धि, एक अनुभव या एक ऊँची अवस्था बन जाता है। लेकिन अगर कहा जाए “यह नहीं, यह भी नहीं”, तो अहंकार को पकड़ने के लिए कोई नई वस्तु नहीं मिलती। नेति-नेति मुझे किसी नई पहचान की ओर नहीं ले जाती, बल्कि मेरी बनाई हुई पहचानों को हटाती है। इसलिए मुझे लगता है कि नकार की भाषा मेरे लिए अधिक कठिन लेकिन अधिक ईमानदार है। सकारात्मक भाषा में मैं सत्य की कल्पना कर सकता हूँ, जबकि नकार मुझे अपनी वर्तमान धारणाओं को देखने और छोड़ने के लिए मजबूर करता है।


















