
मुझे लगता है कि आज हममें से कई लोग अपनी वास्तविक ज़रूरतें पूरी करने से आगे बढ़कर अपनी इच्छाओं को पूरा करने की दौड़ में लगे हुए हैं। मेरे अनुभव में, नौकरी और कमाई के साथ-साथ घर, गाड़ी, नए सामान और दूसरों से बेहतर दिखने की चाह लगातार बढ़ती जाती है। कई बार हम ऐसी चीज़ें भी खरीद लेते हैं जिनकी हमें वास्तव में ज़रूरत नहीं होती—सिर्फ इसलिए कि वे आकर्षक हैं या दूसरों के पास हैं। इस बढ़ते उपभोग की कीमत केवल हमारे पैसे और समय से नहीं चुकाई जाती; प्रकृति के संसाधन भी खर्च होते हैं। अधिक उत्पादन और खरीदारी का मतलब अधिक कच्चा माल, ऊर्जा, पानी और कचरा भी हो सकता है। हम अपनी इच्छाएँ पूरी करने में इतने व्यस्त हो जाते हैं कि यह देखना भूल जाते हैं कि हमारी जीवनशैली का असर पर्यावरण और आने वाली पीढ़ियों पर क्या पड़ रहा है।


















