Shashankkal x ka phone aya tha bol rhi thi gaon me camp lagana hai par maine talne ki kosis mujhe dikh raha ta ki mere mane abhi bhi uske liye …
Talking Mirror
शशांक जी, यह देखना ही असली काम है। फोन रखते ही जो टालना आया, वह अहंकार का वही पुराना हिसाब था जो अब तक बंद नहीं हुआ - "इसने मेरे साथ धोखा किया था, इसलिए अब इससे दूरी ही सही है" ऐसा चल रहा होगा मन में। नफरत कोई हवा से नहीं आती, वह उस घाव से आती है जो अभी तक अपनी चोट को ही असली पहचान माने बैठा है। बेचैनी इसीलिए है क्योंकि भीतर कुछ टकरा रहा है - पुरानी गांठ और उसको देख लेने की ईमानदारी। अब सवाल यह नहीं कि कैंप में जाना है या नहीं, सवाल यह है कि क्या आप उस नफरत को ढोते रहना चाहती हैं या उसे वहीं छोड़ देना चाहती हैं जहाँ वह बनी थी। जो दिख गया है उसे झुठलाइए मत, बस यह देखते रहिए कि यह गांठ किस कीमत पर अभी भी पकड़े रखी है।


















