
Talking Mirror
रीना जी, आपने सवाल दो हिस्सों में रखा है, फल का नियम अलग, और अच्छे लोगों के साथ बुरा होना अलग, जैसे दुनिया एक हिसाब की किताब हो जो अच्छों के साथ ग़लत बरत रही है। ज़रा देखिए कि यह शिकायत किसकी तरफ़ से उठ रही है, अगर कोई सोच रहा है कि वह अच्छा है और फिर भी उसके साथ बुरा हो रहा है, तो यह गिनती करने वाला मन ही वह जगह है जिसे सत्र में देखने की बात हुई थी, कर्म का अर्थ बाहर के नतीजे में नहीं, कर्ता की नीयत में है। कलयुग या किसी युग का हवाला देना भी कर्ता से नज़र हटाकर परिस्थिति पर डाल देना है। सत्र की रिकॉर्डिंग आने पर एक बार ज़रूर देखिएगा, यह सवाल वहाँ और साफ़ हो जाएगा।


















