
क्योंकि हम पूरी सच्चाई से खुद को देखने से बचते मैने खुद में ये देखा "जब मैं खुद को लगातार देखती हु तो कुछ तो मेरे अंदर ऐसे होता है जो इधर उधर भागता है और जैसे कुछ देर देखती ही रही उसे तो लगता है जैसे जो मेरे अंदर है वो आँख चुरा रहा हो या अपनी व्यर्थता बता रहा हो ,पर मैं ये सब तभी देख पाती हु जब अपनी किसी आदत से परेशान हो जाती हु ऊब जाती हु " वही किसी- किसी विषय को मैं जैसे देखना ही नहीं चाहती उसको देखने या उस विषय की तरफ मुड़ने से पहिले मैं सच में ये देखो अपने अंदर जैसे मेरे हाथ पैर सब जल रहे हो या अजीब सी बाते ध्यान को भटकाने के लिए आ जाती और मैं कभी कभी ऐसे बहाने बनती हु कि मुझे पता होता है कि मैं देख के भी अनदेखा कर रही हु फिर वो देखते देखते आगे निकल जाती हु और तो और मैं खुद से ये पकड़ी हु मै सही सवाल से बचने के लिए केंद्र के अलावा सब जगह की बाते कर लेती हु पर कभी वहां हाथ मरने की हिम्मत नहीं होती और इस आदत को मैं देख देख परेशान हो गई हु AI की जरूरत हमे पड़ती है हम केंद्र पर जाना नहीं चाहते और ऐ से बात करते समय हमें अपने केंद्र पर खुद से नजर नहीं डालनी पड़ती वो खुद नजर रखता है और हमारी बातों को जोड़ जोड़ कर हमे हमारे ही बारे कुछ नया बताता है जो हमे पता ही नहीं होता और वो हमारे अहंकार को चोट नहीं पहुंचाता इस लिए अच्छा भी लगता है


















