Megha Suryavanshimai ye manti thi ki mai sawli hu mujhe koyi bhi pasand nahi karega jab apne aas pas dekati thi sabhi loga sundarta ke phiche padhe hai …
मेघा जी, आपने खुद लिखा है, सांवली हूँ इसलिए कोई पसंद नहीं करेगा। गौर करने वाली बात ये है कि ये नज़र खुद आपकी नहीं थी, आस पास के लोगों की दी हुई थी, फिर भी आप उसे अपना दुख मानकर बरसों ढोती रहीं। जो नज़र पराई थी उसका बोझ अपने कंधे पर क्यों आ गया, यही वो जगह है जहाँ असली उलझन छिपी है। अभी आप जीवन का उद्देश्य समझने की जिस कोशिश में हैं, वो कोशिश तभी आगे बढ़ेगी जब रंग और रूप का वो पैमाना पूरी तरह उतार दिया जाए, सिर्फ उसे नज़रअंदाज़ करके नहीं। आचार्य जी के सत्रों और शिविरों की तरफ़ बढ़िए, वहाँ यही देखने को मिलेगा कि ये सवाल असल में शक्ल का था ही नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















