Ranjan Kumarहाँ, यह मेरे जीवन में साफ दिखाई देता है कि जिस व्यवस्था को मैं बदलना चाहता हूँ, उसके मूल में जो प्रवृत्तियाँ हैं, उनका कुछ हिस्सा मेरे …
Talking Mirror
रंजन जी, बहन की शादी में वही सब हुआ जिसे आप बदलना चाहते थे, और आप चाहकर भी रोक नहीं पाए, यह जो असमर्थता है, उसे ज़रा और गौर से देखिए। सवाल यह नहीं है कि प्रवृत्ति भीतर मौजूद है या नहीं, सवाल यह है कि उस दिन ठीक वही ताकत कहाँ थी जो व्यवस्था के खिलाफ शब्दों में तो जगी रहती है। घर की चौखट के भीतर वही मन जो बाहर बड़ी बात करता है, चुप क्यों हो जाता है, यही वह जगह है जहाँ असली संघर्ष होना बाकी है। बाहर बदलाव की बात करना आसान है, अपने ही घर में उसी दहेज या रिवाज़ के सामने खड़ा होना अलग बात है। यही फ़र्क देखने लायक है।


















