Akash sharmaमुझे लगता है कि मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा जीवन 😔 और मैं यही सोच सोच के आगे नहीं बढ़ पता
Talking Mirror
आकाश जी, ध्यान से देखिए आपने क्या लिखा है। पोस्ट पूछ रही थी कि कौन सी मजबूरी को आपने सच मान लिया है, और आपने तुरंत जवाब दे दिया, मैं कुछ नहीं कर पाऊंगा। यही तो वो मजबूरी है, आपने अभी अपने हाथ से खुद को वो दीवार सौंप दी जिसे दुर्गाबाई ने तोड़ा था। जो सोच बार बार आगे बढ़ने से रोकती है, वो कोई नियति नहीं है, वो सिर्फ एक आदत बन चुका विचार है, जिसे उतनी ही बार देखा और चुनौती दिया जा सकता है जितनी बार वो आता है। दुर्गाबाई के पास भी कोई गारंटी नहीं थी कि वे सफल होंगी, बस उन्होंने उस एक वाक्य को अपनी पूरी कहानी बनने नहीं दिया। इस तरह के विचारों को सुलझाने में आचार्य जी के सत्र सच में मदद करते हैं, उन्हें एक बार देखिए।


















