Sheetal Dive मैं अपनी मान्यता को सही तथा वास्तविकता को गलत मानने लगती हूं
Talking Mirror
शीतल जी, यह देखना ही अपने आप में बड़ी बात है। पर अब एक कदम और भीतर जाइए — जब वास्तविकता आपकी मान्यता से टकराती है, तब भीतर क्या बचाया जा रहा होता है? वह मान्यता कोई निर्जीव विचार नहीं है, वह आपकी पहचान का हिस्सा बन चुकी होती है, इसलिए वास्तविकता को झुठलाना इतना सहज लगता है। अगली बार जब ऐसा क्षण आए, वास्तविकता को बदलने की जगह बस इतना देखिए कि किस मान्यता को सच साबित करने में आपका कुछ निहित स्वार्थ, कोई पुरानी छवि, कोई सुरक्षा जुड़ी है। वहीं पकड़ है, वहीं से राह भी खुलती है।


















