Chhoti singhthank you share करने के लिए, आपकी कहानी से में अपने गुजरे दिनों को जोड़ पा रही हूं, मैने भी 2 बच्चों से ट्यूशन पढ़ाना शुरू किया, उस समय…
छोटी जी, दो से पंद्रह बच्चे, ये सफर छोटा नहीं है। और अब फेलोशिप के चलते वो पढ़ाना छूट गया है, ये जो बात आपने यूँही सरका कर कही है, उसमें एक हल्का सा मन का बोझ दिख रहा है, जैसे कुछ अधूरा छोड़ आई हों। ">जुड़ाव है लेकिन समय नहीं, ये सुनने में स्वाभाविक लगता है, पर ज़रा देखिए, जुड़ाव रहता कहाँ है, काम में या नतीजे में? अगर उन बच्चों से जुड़ाव सच में था, तो वो आपके पढ़ाने में था, न कि इसमें कि आप हमेशा उन्हीं को पढ़ाती रहें। फेलोशिप भी वही रास्ता है जिस पर रितु जी चली हैं, अपने पैरों पर खड़े होने का। एक दरवाज़ा बंद होकर दूसरा खुला है, इसे घाटा मानने की ज़रूरत नहीं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















