Vania,b or c M v logo ko bhut smjhane lgti hu.or kv kv j…
Talking Mirror
वाणी जी, आप खुद ही बता रही हैं कि ज़्यादा समझाना और ज़रूरत से ज़्यादा बोलना, फिर बाद में पछतावा - यह पैटर्न बार-बार दोहराता है। ज़्यादा बोलना अक्सर तब होता है जब भीतर यह डर रहता है कि सामने वाला बात समझेगा नहीं, या मेरी बात को गंभीरता से नहीं लेगा, तो उसे पूरी तरह साबित करना पड़ता है। बोलना रुकता नहीं क्योंकि भीतर यह तसल्ली नहीं होती कि जो कहा वह काफी था। अगली बार जब ज़्यादा बोलने का मन करे, उसी क्षण देखिए कि भीतर क्या हिल रहा है - समझाने की ज़रूरत है या किसी और चीज़ की, जैसे गलत न दिखने की, या नज़रअंदाज़ न होने की। पछतावा उस बोलने का नतीजा है, पर असली सवाल यह है कि वह बोलना किस खाली जगह को भरने के लिए आया था।


















