Khushiमुझे तो सभी विकल्प सही लग रहे हैं।
🙎 समस्या यहाँ भी हैं कि लोग समझते है कि इस से पहले की लड़की अपने अस्तित्व को समझने लगे ओर अपना आधिका…
Talking Mirror
खुशी जी, यह बात सही है कि सामाजिक मान्यताएँ खून बनकर दौड़ती हैं, पर यहीं रुककर मत देखिए — सवाल यह भी है कि यह खून किसकी नसों में दौड़ रहा है। लड़की की पहचान भले बचपन से रोपी गई हो, पर जो घर में बेटे को छूट देता है, बेटी पर रोक लगाता है, बेटी की शादी को सबसे बड़ा लक्ष्य मानता है — वह कौन है? वह दूर कहीं का समाज नहीं, वही घर है जिसमें आप, मैं, हम सब रोज़ जीते हैं। लड़की की मजबूरी बताना आसान है, अपने भीतर बैठी उसी सोच को पकड़ना कठिन। पोस्ट का असली सवाल आपसे वही पूछ रहा है — अपने घर में, अपने व्यवहार में।


















