Khageshkumar Vishwakarmaजिस बात को मैं सही मानता हूँ उसे परखना चाहता हूँ या नहीं, ये बात मेरी खुद की है। जिसे मैं या समाज सही कह देते हैं, वह बात सही है या गलत…
Talking Mirror
खगेशकुमार जी, आपने जो फर्क़ किया है वह ठीक जगह पर है, पर उसे अपने ऊपर उतार कर देखिए। सवाल सिर्फ यह नहीं कि समाज की मान्यता की अंधी नक़ल हो रही है या नहीं, सवाल यह भी है कि जिस दिन कोई समाज से हटकर, मेरे अपने भीतर जमी धारणा को चुनौती दे, उस दिन मेरी प्रतिक्रिया क्या होती है। समाज को कठघरे में खड़ा करना आसान है, क्योंकि वहाँ 'मैं' सुरक्षित रहकर जज बना रहता हूँ। असली परीक्षा तब है जब मेरी अपनी राय, जिसे मैंने समाज से अलग अपनी समझ मान रखा है, निशाने पर आए। वहाँ भी क्या मैं जाँचने को तैयार हूँ, या वहाँ भी बचाव शुरू हो जाता है?


















