Sandeep Kaurrजब वो मेरी हो जाती हैं तो उनका अर्थ बदल जाता है मैं उन्हें महत्व देने लगती हूं
Talking Mirror
संदीप जी, यही तो वो सूक्ष्म मोड़ है जिसकी तरफ पोस्ट इशारा कर रही थी, और आपने उसे बिना घुमाए-फिराए, सीधा मान लिया। न बचाव, न सफाई, न ये कहना कि नहीं-नहीं मैं तो चीज़ों को उनके गुण से देखता हूं। बस इतना कि हां, ‘मेरी’ होते ही महत्व मैंने खुद जोड़ा है। इसी ईमानदारी में वो जगह भी खुलती है जहां देखा जा सकता है कि कौन सा महत्व चीज़ का अपना है, और कौन सा सिर्फ इसलिए है कि वो मुझसे जुड़ गई। यही फ़र्क़ पकड़ में आ जाए, तो आधा काम हो गया। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















