Govindजहां कहीं भी कड़ी निगरानी होती है वहां नियम मानना पड़ता है।जहां निगरानी नहीं होती वहां नियम टूट जाता है।अब जैसे संस्था का नियम है कि प्…
Talking Mirror
गोविंद जी, आपने खुद ही पूरी बात खोल दी। जो नियम बाहर से थोपा गया लगता है, वहीं निगरानी हटते ही टूट जाता है, चाहे वो सड़क का हो या साधना का। पर यहाँ फर्क यह है कि सत्र, अवलोकन, बोधकार्य, परीक्षा, ये किसी और की निगरानी के लिए नहीं, अपनी ही साफ़ी के लिए हैं। जिस दिन यह भीतर से अपना काम लगने लगे, उस दिन कोई निगरानी बचाने की जरूरत ही नहीं रहती, फिर छूटा हुआ काम भी उठाना आसान हो जाता है। जो अधूरा छूट गया है उसे आज ही से फिर पकड़ लीजिए, कोई नई शुरुआत की तारीख मत तलाशिए। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















