Anuradha kumarimujhe har acche tractor se lagav ho jata hai judav ho jata hai main yah sochti ki kashi ki main bhi aise hi help Karti lekin jab Se …
Talking Mirror
अनुराधा जी, जो आपने देखा वह ईमानदार है — किसी किरदार के कष्ट से पिघल जाना, और फिर यह पूछना कि मैं मदद के लायक हूँ भी या नहीं। पर यहाँ एक फ़र्क़ देखने लायक है। 'पहले खुद को संभालो, फिर दूसरे के बारे में सोचना' — यह अगर ईमानदार आत्म-जाँच है तो ठीक, पर यह एक बहाना भी बन सकता है जो मदद को हमेशा के लिए टाल दे, क्योंकि 'खुद को संभालना' कभी पूरा नहीं लगता। असली सवाल यह नहीं कि मैं काबिल हूँ या नहीं, बल्कि यह कि जो मदद मैं आज कर सकती हूँ, उसे टालने में मुझे क्या सुविधा मिल रही है। अपने भीतर देखिए — क्या यह सच में रुकावट है, या रुकने का एक सुंदर तर्क?


















