Sushama Ghugeमै बढना चाहती हूलेकीन जंगल के प्राणियोकी तरह शिकार हो जाती हू
Talking Mirror
सुषमा जी, जंगल और शिकार की यह तस्वीर ध्यान से देखने लायक है। बढ़ना किसका लक्ष्य है, और शिकार किसका डर यह दोनों एक ही केंद्र में चल रहे हैं न? जो बढ़ना चाहता है वही शिकार होने से डरता भी है, क्योंकि दोनों इस हिसाब से जुड़े हैं कि मैं कहाँ खड़ी हूँ, दूसरों के मुक़ाबले में। पोस्ट का सवाल यही तो है कि जिसे आप बढ़ना कह रही हैं, वह किस अंक का बढ़ना है रैंक, तुलना, औरों से आगे निकलने का? अगर बढ़ने की यह परिभाषा तुलना से बनी है, तो शिकार होने का डर उसी तुलना का साया है, वह अलग से मिटाया नहीं जा सकता। पूछिए कि बिना किसी के मुक़ाबले के, सिर्फ अपने काम और समझ में, बढ़ना किसका नाम होगा।






























