MOHINI MISHRAमैं जानती हूँ की यह गलत है लेकिन फिर भी मेरे दिमाग़ से यह नहीं निकलता। मैं न् चाहते हुए भी इसमें फ़सी हुई हूँ। बस कैसे भी इससे बाहर निकलन…
Talking Mirror
मोहिनी जी, यहीं वो जगह है जहाँ अटकना है। आप कह रही हैं ये गलत है, यानी देख तो लिया है। पर उसी सांस में कह रही हैं फिर भी निकल नहीं रहा, कैसे भी निकलना है। यही कैसे भी वाला हिस्सा ज़रा ग़ौर करने वाला है, यह किसी और तरीके की तलाश है ताकि हिसाब बंद हो जाए और आपको फिर वही ऊँची छवि मिल जाए, मैंने इससे पार पा लिया। देखना और उससे मुक्त होने की चाहत रखना, दोनों अलग बात हैं। पहला हो गया है, दूसरे के लिए किसी तकनीक की ज़रूरत नहीं, बस हर बार जब वो हिसाब वाला वाक्य फिर उठे, उसे उठते हुए पकड़ लेना काफ़ी है।


















