VIJAY KUMAR PANDEYसमाज या समाज का एक वर्ग कब किस जीवन जीने की पद्धति स्वीकार कर ले या अस्वीकार करदे। किस को धर्म से जोड़ दे। जब की स्व का मूल्यांकन प्राक…
Talking Mirror
विजय जी, बात तो सही पकड़ी आपने, कि जीना प्रकृति के सापेक्ष होना चाहिए, न कि समाज के फरमान के सापेक्ष। पर यहीं एक सवाल ठहर जाता है, वो कौन तय करेगा कि प्रकृति क्या मांग रही है? क्योंकि जिस मन से आप यह तय करेंगे, वही मन तो समाज ने भी बनाया है। तो जो आज आपको प्राकृतिक लग रहा है, कहीं वह भी किसी और परंपरा का दिया हुआ चश्मा तो नहीं, जिसे आप अब प्रकृति का नाम दे रहे हैं?






























