
मेरे यहां एक आंटी है उसकी लड़की विदेश गई पढ़ने और जॉब करने तो कहती है कि मैने इतने सालों तक पूजा की ,शिव जी पर जल चढ़ाया, और मुझे एक प्रदीप मिश्रा गुरु ने बताया कि शिवलिंग पर बेल धतूरा चढ़ाओ इतनी बार मंदिर के दर्शन करने जाओ इतने व्रत रखो ,ऐसा ऐसा दान करो,तो ये सब करने पर मेरी बेटी विदेश जा पाई, और मैने पीपल देवता के चक्कर लगाए ,डोरा बाँधा इसलिए मेरी मनोकामना भगवान ने पूरी की, और मेरी लड़की विदेश जा पाई जबकि चुनाव उस लड़की का था और उसमें मदद एक बाजू में पड़ोसी ने भी की थी लेकिन इन सबको वो भगवान का चमत्कार और खुद की पूजा का श्रेय देती है,अंध विश्वाश की जड़ भीतर तक धंसी पड़ी है ,कि भगवान सिर्फ मनोकामना का साधन बन कर रह गए है।मूर्ति का उपयोग सिर्फ अपनी कामना पूरी करवाने तक रह गया है।जबकि मूर्ति पूजा का अर्थ अभी हाल ही के सत्र में आचार्य जी ने समझाया था कि मूर्ति पूजा ना अच्छी है ना बुरी वो आप पर निर्भर करता है कि मूर्ति के सामने तुम किसलिए खड़े हो?,अगर मूर्ति को देखकर भीतर की क्षुद्रता दिखने लगे , मूर्ति को देखकर अगर भीतर कुछ टूटने लगे तो मूर्ति पूजा सफल है,वरना तो बस अहंकार का विस्तार मात्र है।


















