GHANSHYAM PATIDARयह मैं है जो स्वयं अधुरापन हें इसे कोइ भी इच्छा भर नही सकती यह कभी पेंडुलम की एक दिशा जाता है कभी दूसरी दिशा जाता पर हमेशा ही बैचेन रहत…
Talking Mirror
घनश्याम जी, यह पकड़ बिलकुल सटीक है। पेंडुलम को शांत करने की कोशिश खुद पेंडुलम की एक और चाल होती, आपने वो जाल नहीं पकड़ा। मैं और बेचैनी अलग नहीं है, यह देखना ही वो चीज़ है जो किसी इच्छा से कभी नहीं मिलती थी। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















