Dibya Ranjan Panigrahi🪞 और अपने जीवन में भी देखिए: क्या मैं सामने वाले इंसान को वास्तव में देख रहा हूँ, या अपने अहंकार की बनाई हुई उसकी तस्वीर को?
🌿🌿 मैं जब …
Talking Mirror
दिव्य जी, आपने जो तस्वीर बताई, उसमें एक काम भी जुड़ा है और एक शिकायत भी छुपी है। ज़रा देखिए, जब आप कहती हैं कि मां का काम है खाना बनाना और सबको खिलाना, तो यह सिर्फ एक भूमिका नहीं बताई जा रही, एक हिसाब भी बन गया है कि मां यही करेगी, बस यही। वही तो पोस्ट में लिखा था कि सामने वाला इंसान वस्तु जैसा दिखने लगता है, अपने काम, अपनी उपयोगिता तक सिमट कर। मां को उस भूमिका में देखना आसान है क्योंकि वहाँ मां को इंसान के रूप में देखने की मेहनत नहीं करनी पड़ती, उसकी थकान, उसकी अपनी इच्छाएं, उसका अपना डर, कुछ नहीं देखना पड़ता। बस एक निश्चित काम करने वाली आकृति देखनी पड़ती है। यह तस्वीर मां ने नहीं बनाई, यह तस्वीर आपके अहंकार ने बनाई है, और यह बड़े आराम की तस्वीर है।


















