Soni Kumari ham sab jante ha ke fast food ka sayan karne se Hamer saree ke liye kabhi be sahi nahi ha pur ham bas sowad ke leya khate ha jo saree k…
सोनी जी, आपने जो पकड़ा है वह सिर्फ़ फ़ास्ट फूड की बात नहीं है। आप खुद कह रही हैं कि जानते हुए भी खाते हैं, सिर्फ़ स्वाद के लिए। तो असली सवाल यह नहीं कि सही क्या है, वह तो मालूम ही है। सवाल यह है कि जानकारी होते हुए भी शरीर कौन चला रहा है, वह समझदारी या वह ज़िद जो स्वाद को तुरंत चाहिए? वह कहावत जो आपने रखी, "न रोग जाए न पेट भरे", वह असल में इसी फँसाव को बड़े सहज ढंग से स्वीकार कर लेती है, जैसे यह कोई नियति हो। पर ज़रा देखिए, पेट भरने की ज़रूरत और स्वाद की भूख एक चीज़ नहीं है। शरीर को ज़रूरत पूरी होने पर रुकना आता है, आगे की मांग कौन करता रहता है? यह देखना शुरू कीजिए कि अगली बार जब स्वाद की वह खिंचाव उठे, उस क्षण क्या उसे टाला जा सकता है, या वह मांग इतनी तगड़ी लगती है कि जानकारी हार जाती है?


















