
शादी के पहले जो कमाती थी अपनी पढ़ाई और अपनी सामान्य जरुरत पर खर्च करती थी। शादी के बाद कमाना बन्द हुआ। मेरी पढ़ाई के अलावा और कोई चाहत ही नहीं रही। मैंने जो पढ़ाई के वक्त सीखा सादा जीवन उच्च विचार इसी विचार के आधार पर ही मै जीवन जीती थी ।मेरी शिक्षा के अलावा कोईअनावश्यक खर्च कभी रहे ही नहीं।न मुझे ढेरों कपड़े चाहिए थे न ही सौन्दर्य प्रसाधन और न ही ज्वैलरी शादी के बाद भी मैं कभी कुछ नहीं लगाती थी जब बाहर जाते थे तभी कर लेते थे। लिखते लिखते फिर अपने बारे में कुछ चीजें याद आने लगी मुझे कभी लड़कियों की तरह रहना पसंद था ही नहीं। मुझे कोट पैंट जीन्स पहनना और एक दम लड़को की तरह बाल रखना और मार्शल आर्ट सीखना की ज्यादा तमन्ना रही।वो भी उस समय में जब लड़कियों को 10 वर्ष के बाद फ्रांक पहनना भी एलावा नहीं था।एक बार पापा ने फ्रांक ला के दी मैंने पहनीं तो डांट पड़ गई कि अब सलवार सूट पहना करो सच कहें मैंने ही अपने घर में हर सामाजिक परम्परा के खिलाफ काम किए। शादी में भी कुछ ज्वैलरी की वज़ह से लड़ाई-झगड़ा हुआ मैंने शादी का सारा सामान उठाकर फेंक दिया और सारी चूड़ियां ज़मीन में हाथ पटकर तोड़ डालीं थी । तो हमारी बुआ कहने लगी ये सुहागन की चूड़ियां विधवा होने पर तोड़ी जाती है। और सारे बरातियों के बीच सूट पहन कर टहलने लगी ।उस वक्त कितना गुस्सा था और अब हंसी आ रही है ये लिखते हुए। मैं कब क्या करती थी मुझे खुद पता नहीं। कुछ सवाल से अलग होता जा रहा है मगर याद आया तो लिख रहे हैं। शादी के बाद भी मैं बोलती तो कुछ नहीं थी मगर मेरी आदते सबको परेशान जरूर करती रही। क्योंकि मैं अपने स्वभाव के विरुद्ध चल नहीं पाती। और मेरा आचरण हमेशा सामाजिक परम्परा के खिलाफ ही रहा।हर कोई मुझे महिला बनाने में लगा मगर मुझे पल्ले नहीं पड़ता है। क्या करूं। शादी के बाद सलवार सूट पहना उसमें यहां एक अजूबा जैसे हो गया अब इसमें सबको दिक्कत होने लगी। और एक चीज अभी याद आ रही है,कि हमारी शादी के बाद यहां कोई महिला सूट नहीं पहनती थी। ये शुरूआत यहां मेरे से ही प्रारंभ हुई। और इसके बाद देखा जो मेरे से बड़ी यहां की बहुएं थीं,वो सब सूट में आने लगी हमने कभी इस पर ध्यान नहीं दिया। मगर अभी अभी ये विचार आया कि ये भी एक क्रांति की तरह ही कार्य हुआ । शादी के बाद सलवार सूट पहना और हाउसवाइफ के लिए ये भी एक तरह की चुनौती रही। यहां तक तो ठीक और अब मैंने जब 30की उम्र में जीन्स टॉप पहना ये सबसे बड़ा अजूबा हो गया। मेरी मम्मी भी कहने लगी ये तुम करती क्या रहती हो । मैंने कहा जो मुझे अच्छा लगता है वो करते हैं बस ।सच बताऊं मैंने कभी ये नहीं सोचा था कि जब मायके में ये सब वर्जित है, वो काम सब मेरे से ससुराल में हो रहे हैं।अब तो मुझे खुद नहीं पता कि मेरे से और क्या क्या होगा। कहां बात पैसे की थी। और कहां पहुंच गयी। पहले मेरा यही था कि इस वक्त मैं अपने पूरे पैसे संस्था को ही दे देंगे मगर जब देखा कि एक बार रविन्द्र के पैसे से दिल्ली गए। उसके बाद हर कोई यही कह रहा ये पैसे बर्बाद कर रही है । मेरे घर में सब पीछे पड़ गए।कि जब आमदनी नहीं है तो काहे बर्बाद कर रही हो । तब मैंने सोचा मैं संस्था तो नहीं छोड़ूंगी अपने से ही अरेंजमेंट करके एक बार आफलाइन सत्र करने के बाद सारे पैसे संस्था को दे दूंगी। बस इससे ज्यादा और कुछ नहीं। मुझे और किसी से पैसे नहीं चाहिए।मैं स्कूल जाकर देख चुकी। वहां काम करने से ज्यादा मुझे अपना करने में बेहतर लगा। वहां बच्चों को सिर्फ स्कूल के हिसाब से पढ़ाना होगा मगर मैं बच्चों को अपने तरीके से सिखाना चाहती हूं ।या कह लीजिए मुझे दूसरे के निर्देश से काम करना पसंद नहीं।


















