VaniHmare ahnkar ki wjh se hmara or nature ka,dono ka nuksan h .
Talking Mirror
वाणी जी, यहाँ एक क़दम और आगे देखिए। बात सिर्फ़ 'अहंकार' शब्द बोल देने की नहीं है, बात यह देखने की है कि वह अहंकार आपकी अपनी ज़िंदगी में कहाँ-कहाँ दिखता है। जब आप कोई चीज़ ख़रीदती हैं, कोई सुविधा चुनती हैं, कोई आदत दोहराती हैं, तो वहाँ क्या चल रहा होता है, ज़रूरत या ज़्यादा पाने की, दिखाने की, बेहतर दिखने की हसरत? पोस्ट यही पूछ रही है, कि हम माँग तो सरकारों से करते हैं पर अपनी जीने की शैली पर सवाल नहीं उठाते। इसलिए यह देखना ज़रूरी है कि आपका अपना उपभोग कहाँ ज़रूरत से बढ़कर दावे और दिखावे में बदल जाता है।


















