Sanghmitra keerमेरे जीवन में परिस्थितियों द्वारा तय की गई सीमाएँ बहुत कम हैं, क्योंकि मेरी परिस्थितियाँ कुल मिलाकर अच्छी हैं। हाँ, घर की कुछ आर्थिक ज़…
Sanghmitra जी, "रात हो गई है और मैं थक गई हूँ" वाली बात ऐसे आती है जैसे शरीर ने खुद रिपोर्ट भेजी हो, पर देखिए कि वह फ़ैसला सुनाने के लिए कब आती है, जब काम सामने आता है। थकान की सूचना और काम से बचने की सहूलियत एक ही मेज़ पर तैयार होती हैं। आपने इसे "आलसी हूँ" का नाम भी दे दिया है, और नाम मिलते ही वह एक पक्की पहचान बन जाती है जिसके सामने कोशिश करना बेकार लगने लगता है। पिता की धारणा में एक और बात छुपी है। उन्होंने एक वाक्य कहा था, और उस वाक्य को सीमा की तरह आज तक ढोने का काम आप कर रही हैं। उनका अंदाज़ा सिर्फ़ तभी आपका फ़ैसला बनता है जब आप उसे अपनी तरफ़ से मंज़ूरी देती रहें। इस परीक्षा की तैयारी की मेज़ पर आज रात बैठकर देखिए कि वह थकान कितनी देर टिकती है। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401






























