Amit Chaurasiyaसंस्था से जुड़ने से पहले मै भीड़ को ही अंतिम फैसला मन लेता था पर अब चुप रहता हु लेकिन वो चुप्पी मुझे कचोटती है कुछ जैसे भीतर टूट था है।
अमित जी, यह जो चुप्पी आपको कचोट रही है, वही असली संकेत है कि कुछ अधूरा रह गया है। भीड़ के फैसले को मान लेना एक बात थी, और अब चुप रह जाना दूसरी बात है - पर दोनों में कर्ता वही है जो किसी के साथ खड़ा होने से बच रहा है, सवाल उठाने से बच रहा है। चुप्पी यहाँ तटस्थता नहीं, बल्कि एक सुरक्षित दूरी है - न भीड़ के साथ, न उसके खिलाफ़। जो टूटन भीतर महसूस हो रही है, वह इसलिए है क्योंकि आपने देख तो लिया है कि चुप रहना भी एक चुनाव है, सही और गलत के बीच की जगह नहीं। अब सवाल यह है कि जब अगली बार कोई भीड़ किसी को कठघरे में खड़ा करे, तो क्या आप सिर्फ चुप रहेंगे, या वही सवाल पूछने का साहस जुटाएंगे जो उस कहानी में पूछा गया था। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















