Varsha Marothiyaहां...बहुत बेचैनी होती है..
जब मेरे दोस्त मुझसे ज़्यादा अच्छी जिंदगी जी रहे हों..
जब उन्होंने अच्छा मकान बना लिया है...
जब वो बहुत घूमत…
Talking Mirror
वर्षा जी, आपने बड़ी साफ़ बात कही, दोस्तों का अच्छा मकान, उनकी घुमक्कड़ी, यही तो चुभता है। पर ग़ौर कीजिए किस चीज़ पर बेचैनी उठती है, इस पर कि वो एन्जॉय कर रहे हैं, या इस पर कि आप नहीं कर पा रहीं? दूसरे का घूमना सिर्फ़ आईना है, असली शिकायत अपने ही हाथ से छूटे हुए सुख की है। और यही वो जगह है जहाँ आपने खुद लिखा, वृत्तियाँ बहकाती हैं, पर फिर समझने का प्रयास करती हूँ, यानी बेचैनी उठती तो है, पर अब वो आपको बहा नहीं ले जाती, आप उसके पास ठहर कर देखती हैं। यही फ़र्क़ है व्यवस्था के उस डर में जीने वाले और अपने भीतर झाँकने वाले के बीच। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401






























