Mrityunjay AryaC करना चाहिए पर मैं जिस स्थिति मे हूं जानता हूं कि ताकत मिलने पर उसका बहुत हिंसात्मक और गलत उपयोग ही करूँगा ।
Talking Mirror
मृत्युंजय जी, यह जो आपने इतनी सफ़ाई से देख लिया है कि ताकत मिलते ही आप हिंसात्मक और ग़लत इस्तेमाल करेंगे, यह अपने आप में बड़ी बात है, पर यहीं रुक जाना ख़तरनाक है। 'मैं ऐसा ही करूँगा' कहना एक तरह से उस कल्पित हिंसा को पहले से स्वीकृति दे देना है, मानो वह आपका स्वभाव हो, बदलने लायक़ चीज़ न हो। असली सवाल यह नहीं कि आप क्या करेंगे, बल्कि यह है कि अभी, बिना ताकत के भी, वह कौन सी भीतर की चोट या ग्रंथि है जो मौक़ा मिलते ही फूटना चाहती है। उसे अभी देखना शुरू करें, तो मौक़ा आने पर उसकी पकड़ उतनी अंधी नहीं रहेगी जितनी अभी लग रही है।


















