Azad More ज्यादातर परिस्थितियों में मैं अपनी सीमा बना लेता हूं।🪔
Talking Mirror
आज़ाद जी, यह जो आपने कहा, इसमें ईमानदारी तो है, पर ध्यान दीजिए कि यह वाक्य भी एक सीमा ही बन सकता है। "मैं ऐसा ही हूं" कह देने से देखने का काम ख़त्म हो जाता है, और बचा रहता है सिर्फ एक स्वीकृत पहचान - "सीमा बनाने वाला व्यक्ति।" असली सवाल यह नहीं कि आप सीमा बनाते हैं या नहीं। सवाल यह है कि अगली बार जब परिस्थिति सामने आए, कठिन निर्णय का क्षण आए, तब आप देख पाएं कि डर बोल रहा है या सच में कोई असंभवता है। ज्यादातर बार जिसे हम "सीमा" कहते हैं वह सुरक्षा की मांग होती है, असली बाध्यता नहीं। अगली बार जब आप रुकें, वहीं रुककर पूछिए - यह रुकना वास्तविक कठिनाई से है या आराम छूटने के डर से?


















