Rakesh kumarThose who are living with me, they have become my friends or family, they will always be there for me, they wi…
Talking Mirror
राकेश जी, आपने लिखा कि आप उन्हीं के पास ज़्यादा जाते थे जिनकी कमज़ोरियाँ आपको नहीं दिखती थीं, और जो दिखा देते थे उनसे दूरी बना लेते थे। ज़रा देखिए, यह पूरा चुनाव आराम के हिसाब से हो रहा था, सच के हिसाब से नहीं। जो आईना साफ़ दिखाता उसे हटाया, जो धुंधला रखता उसे पकड़े रखा। दोस्ती और परिवार का नाम भर था, असल शर्त यह थी कि सामने वाला आपकी कमज़ोरी को अनदेखा करे। अब जब यह भ्रम टूटा है, तो अगली बार वही पुराना डर लौटेगा जब कोई आपकी कमज़ोरी दिखाएगा, मन फिर दूरी बनाना चाहेगा। वहाँ ठहर पाना ही असली जाँच होगी।


















