
स्वतंत्रता का अर्थ हैं अपनी चेतना का उपयोग कर पाना,तथ्य और शर्तों के आधार पर जीवन जीने का निर्णय ले पाना(शिक्षा), ना कि आर्थिक दृष्टि से सक्षम होना।आंकड़े बताते हैं कि महिला रोजगार बढ़ा हैं,पर नेतृत्व करने में उनकी भागीदारी कम है। क्योंकि समाज ने उन्हें शिक्षा नहीं दी,उनको अपने स्वार्थ में बांधा और उसे प्रेम,सम्मान,त्याग,आदर्श का नाम दिया। विवाह व मातृत्व के बाद उनका नौकरी ना करना दिखाता हैं कि परिवार देखना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी,कर्तव्य हैं और उसकी चेतना,जिज्ञासा,भविष्य में और बौद्धिक और शारीरिक रूप से विकसित होने की संभावना को अनदेखा कर जाता हैं और पुरुष को आगे बढ़ा देता,जबकि परिवार बनाने और बढ़ाने में दोनों की भागीदारी होती हैं।इस तरह का वर्गीकरण स्त्री के दायरे को संकीर्ण,पुरुष के दायरे को विस्तृत करता हैं और समाज में एक निर्भर तो दूसरी तरफ निर्णय लेने वाला,आर्थिक सहायता देने वाले वर्ग का निर्माण करता हैं। ये समाज दोनों वर्गों में हीन,निम्न,आधारित रहने वाले अहंकार तो दूसरी तरफ घर चलना, निर्णय लेना ,मुझे देखना है वाला अहंकार जन्म लेता हैं और समाज अज्ञान में जीता हैं। ये व्यवस्था समाज को मजबूत नहीं होने देती, कमजोर, निर्भर, अपंग बनाती हैं। कुपोषण ,गरीबी , गंदगी,जनसंख्या वृद्धि, अंध विश्वास, तनाव अशिक्षा व पर निर्भरता के कारण है।


















