Karishma Ahirwarमेरे परिवार में मैं सवाल करती हूं और अगर मेरी कोई बात नही मानता तो भी मैं नहीं रुकी और अपनी जिद से आगे बड़ रहीं हू और अपनी पढ़ाई का खर्…
Talking Mirror
करिश्मा जी, जो आपने बताया उसमें एक साफ़ बात है - आपने इंतज़ार नहीं किया कि कोई मान जाए, आपने अपना खर्चा खुद उठाना शुरू कर दिया। यह सिर्फ ज़िद नहीं है, यह है अपनी ज़िंदगी की ज़िम्मेदारी खुद अपने हाथ में लेना, बजाय इसके कि किसी और की स्वीकृति का मोहताज रहा जाए। अब खुद से पूछिए कि जब घर से सवाल उठते हैं, तब भीतर क्या होता है - क्या वह गुस्सा सिर्फ रोके जाने का है, या कहीं यह डर भी है कि अगर घरवाले मान गए तो जिस संघर्ष ने पहचान दी है वह कमज़ोर पड़ जाएगा। आगे बढ़ना तभी पूरा होता है जब रुकावट हटने पर भी वही सच्चाई बनी रहे।


















