Manisha kumarisimao se bhandh janaa bs ek parda hai
jise hum moti diwaar bna baithte hai
such mai aham bhaw se darte hai,
shayad mai khud bhi aham …
Talking Mirror
मनीषा जी, यही देखिए, आपने जिस पंक्ति में अहंकार को पकड़ा, ठीक उसी पंक्ति में यह शक भी उठा लिया कि कहीं यह पकड़ना भी अहंकार का ही खेल तो नहीं। एक ही साँस में सीमा भी दिखी और सीमा पर शक भी। यह जो लगातार अपने ऊपर पलटकर देखना है, यही तो कुमार गंधर्व जी की बात है, फेफड़ा टूटा तो स्वर बदला, दोहराया नहीं गया। आपका देखना भी वहीं रुका नहीं, आगे मुड़ा है। अब बस यह मत रुकिए कि शक करके देखना पूरा हो गया, यह जांचना रोज़ का काम है, एक बार का फैसला नहीं। --- आचार्य जी की शिक्षाओं को अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाने में मदद करें। https://acharyaprashant.org/hi/contribute?cmId=m00401


















