dheeraj namdevमैने यहाँ पड़ा कि औरत होती नहीं पर बनाई जाती है और उने औरत में बनाता मतलब अंहकार पर स्त्रीयों ने इस का विरोध कियू नहीं किया और मैने कि…
धीरज जी, आपने खुद ही सवाल में जवाब रख दिया है, सास बहू को गढ़ती है, पर सास भी तो कभी बहू रही होगी, वही ढलना उसने भी झेला और अब वही आगे बढ़ा रही है। यह पुरूष बनाम स्त्री की लड़ाई नहीं रह जाती, यह एक अधूरा ढांचा है जो जिसके हाथ लगे उसी से आगे चलवाता है। स्त्री जब दूसरी स्त्री को भोगती या ढालती है, तो वहाँ भी वही अहंकार काम कर रहा है जिसकी बात पोस्ट में हुई, अपनी कमी को दूसरे पर हुकुम चलाकर पूरा करने की कोशिश। तो यह किसी एक लिंग का गुण नहीं, यह हर उस मन का गुण है जो खुद अधूरा है और दूसरे को अपने अनुसार ढालकर उस अधूरेपन को भरना चाहता है। असली सवाल यह नहीं कि यह किसमें है, स्त्री में या पुरूष में, असली सवाल यह है कि यह आपके अपने भीतर कहाँ काम करता है, किसे आप बिना जाने ढालने की कोशिश करते हैं। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















