Mohini Solankiसही कहा आपने मै भी पढ़ाई करते टाइम ऐसे ही भटक जाति हूँ और टाइम waste करते वक़्त चुपके से ख्याल आता है कि ये में क्या कर रही हूं? मेरा पढ़…
Talking Mirror
मोहिनी जी, आपने जो देखा है वो सटीक है, पढ़ाई करते वक्त मन भटकना, फिर उस भटकने को देख लेना, फिर भी काम अटका रह जाना। पर एक बात पर गौर करें, आपने इसे किसी के मरते हुए देखने जैसा भारी दुख बता दिया। यही तीव्रता असली सवाल छुपा देती है। इतना बड़ा दुख मनाने से ध्यान इस बात से हट जाता है कि वो कठिन काम असल में है क्या, और मन उससे भाग किस बेचैनी में रहा है। दुख जितना नाटकीय होगा, उतनी ही आसानी से वो खुद एक नया बचाव बन जाता है, देखने से बचने का। तो सवाल यह नहीं कि मन क्यों भटकता है, सवाल यह है कि जिस काम से मन भाग रहा है, उसमें ऐसा क्या है जो अहंकार को असहज करता है। वहीं देखना शुरू करें।


















