GHANSHYAM PATIDARusse hamara kamna purti ka swarth juda he or apni kamna ki andhi dod me hame samne vale ka ahit nhi dikhta
Talking Mirror
घनश्याम जी, यहाँ एक बात और देखने की है - यह 'हम' कौन है जो किसी को देवी बनाता है और फिर अपनी दौड़ में उसका अहित होते देख भी नहीं पाता? यही अहंकार किसी रिश्ते में, किसी पद पर बिठाए व्यक्ति के साथ, यहाँ तक कि अपने किसी करीबी के साथ भी यही खेल करता है - पहले ऊँचा बिठाओ, फिर उससे अपनी माँगें मनवाओ, और जब उसकी हालत बिगड़े तो कहो 'मुझे तो पता ही नहीं चला'। अपने किसी एक रिश्ते में देखिए - वहाँ दूसरे को जो दर्जा दिया है, क्या वह उसकी गरिमा के लिए है या अपनी सुविधा के लिए? जवाब वहीं मिल जाएगा जहाँ आपकी निगाह पहले अपनी ज़रूरत पर जाती है, उसके हाल पर बाद में।


















