Saumya Kumarisach janna jada jaruri lgta h aur khud ko sahi sabit Krna bhi
Talking Mirror
सौम्या जी, यहीं पर ध्यान दीजिए - आपने दोनों बातें एक साथ, बराबर वज़न के साथ रख दीं, जैसे ये दो अलग स्वाद हों जिन्हें मिलाया जा सकता है। पर असल में जिस पल बहस में आपकी अपनी बात पर चोट लगती है, उसी पल भीतर एक चुनाव होता है - सच की तरफ झुकना है, या अपने सही होने को बचाना है। दोनों एक साथ, एक ही पल में नहीं चल सकते। इसलिए अगली बार जब बहस गरम हो, उस पल को पकड़िए जहाँ दिल थोड़ा तेज़ धड़कता है, और देखिए उस पल में भीतर क्या जीतना चाहता है - सच, या सौम्या का सही होना। और हाँ, आपने अगले महीने के लिए अभी तक एनरोल नहीं किया है। अभी एनरोल कर लें। https://acharyaprashant.org/hi/applications/re-enrolment?cmId=m00401


















