Pushpa Lahu Dudhabhateमेरी एक मान्यता यह हो सकती है कि “मैं जो सोचती हूँ, जो मानती हूँ और जिसे सही समझती हूँ, वही सच है।”
लंबे समय तक हम अपनी मान्यताओं को सह…
पुष्पा जी, आपने खुद ही बता दिया मेहनत, पैसा, सम्मान जुटाकर भी मन में शांति नहीं मिलती। मज़ेदार बात ये है कि ये जो नई समझ है, इसे भी आपने कितनी आसानी से एक नई मान्यता बना लिया, वही पुराना ढाँचा, बस कपड़े बदलकर। पहले विश्वास था बाहरी सफलता काफी है, अब विश्वास है शांति ज़रूरी है, सोचने वाला अब भी वही बैठा है जो किसी एक बात को पकड़कर 'यही सच है' कह रहा है। जाँच वहाँ रुकती नहीं, जहाँ एक मान्यता की जगह दूसरी मान्यता बिठा दी जाए। वो तो वहाँ से शुरू होती है जहाँ आप पूछें कि शांति की तलाश करने वाला ये मन कौन है, जो कभी सफलता में बँधता है, कभी शांति में। एस्चर की तस्वीर में जैसे पक्षी से मछली बनती है, वैसे ही एक पकड़ से दूसरी पकड़ बनती रहती है, तस्वीर वही रहती है, आँख बस रूप बदलती है।


















