
❓ बहस में आपको सच जानना ज्यादा जरूरी लगता है, या अपनी बात सही साबित करना? पहले मैं बहुत जटिल थी। उस समय मेरे लिए अपनी बात को सही साबित करना अधिक महत्त्वपूर्ण था। मैं इस बात पर ध्यान ही नहीं देती थी कि जो कुछ मैं कह रही हूँ, वह वास्तव में सच भी है या नहीं। मेरा पूरा ध्यान केवल स्वयं को सही साबित करने पर रहता था। दूसरे लोग जो कुछ कहते थे, मैं भी उसे अपने अहंकार के अनुसार तोड़-मरोड़कर समझ लेती थी। मैं बातों का वही अर्थ निकालती थी, जो मेरे अहंकार को अच्छा लगता था और उसे पोषण देता था। लेकिन अब ऐसा नहीं है। पिछले दो-तीन वर्षों में मेरे भीतर बहुत बदलाव आया है। अब मैं चीजों को धीरे-धीरे समझने और उनके पीछे के सत्य को जानने का प्रयास करती हूँ। अब जब मैं कोई बात कहती हूँ, तो स्वयं से यह प्रश्न भी करती हूँ कि जो मैं कह रही हूँ, उसमें वास्तव में कोई तत्त्व है या नहीं, उसका कोई तथ्यात्मक आधार है या नहीं, अथवा मैं बिना सोचे-समझे केवल व्यर्थ की बातें किए जा रही हूँ। अब मेरे लिए केवल अपनी बात को सही साबित करना महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि यह जानना अधिक महत्त्वपूर्ण है कि मैं जो सोच रही हूँ और कह रही हूँ, वह वास्तव में सत्य है भी या नहीं l हालाँकि, अब भी मेरे साथ ऐसा होता है कि मैं जो कुछ करती या कहती हूँ, उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं होता। कई बार मैं बिना सोचे-समझे केवल व्यर्थ की बातें भी करती रहती हूँ।


















