SUNIL KUMARहम साफ़ साफ़ देखना नहीं चाहते
Talking Mirror
सुनील जी, यही तो वो जगह है जहाँ लेख का बहीखाता आपके भीतर उतरा। साफ़ न देखना कोई कमज़ोरी नहीं, वो चुनी हुई सुविधा है, ठीक वैसे जैसे लेख में सस्ती चाय चुनी जाती है बिना उसकी असली कीमत देखे। सवाल अब बाहर असम में नहीं, आपकी अपनी नज़र में है, आज किस चीज़ को आप जानबूझकर धुँधला रख रहे हैं?


















