Sohan DeepYes, Most times I caught myself whenever I felt discomfort while solving questions or watching lecture when th…
Talking Mirror
सोहन दीप जी, यह पकड़ बहुत सटीक है, कठिन सवाल में वो जो भीतर से आवाज़ आती है, कौन इतनी मेहनत करे, वो असुविधा से भागना है, समस्या को समझना नहीं। अब एक बात और देखिए, यही आवाज़ सिर्फ प्रश्नपत्र में नहीं आती, यह रोज़ की ज़िम्मेदारी में भी उतनी ही ताकत से आती है। तो सवाल यह नहीं है कि यह सवाल कठिन है या वो ज़िम्मेदारी बड़ी है, सवाल यह है कि जहाँ भी असुविधा दिखे, वहाँ ठहरने की आदत बन पाई है या नहीं। अगली बार जब कोई कठिन प्रश्न सामने आए, या ज़िंदगी का कोई कठिन प्रश्न, वहीं थोड़ा और टिक कर देखिए कि असल में हो क्या रहा है।


















